ग़ज़ल आई है, ग़ज़ब ढाई है। : रविश कुमार


रविश कुमार 

ग़ज़ल आई है, ग़ज़ब ढाई है। 
डालडा हो गए हैं, वो बावला हो गए हैं 
अपने स्तर से हुज़ूर, कनस्तर हो गए हैं




चुनाव आया है चुनांचे रूमाल हो गए हैं 
आँसुओं के सहारे हैं, भाषणों में रो रहे हैं

ग़ैरत ही न बची तो बाकी क्या बचाना है
हुज़ूर का मलबा पड़ा रहे, हटाना क्या है

आप ही अमीर हैं, आप ही आप ग़रीब हैं 
तरीका न सलीका, जीत की तरकीब हैं

बस ज़ुबान की कमी है, शान तो बहुत है
हुज़ूर को एक माइक दे दो, झूठ बहुत हैं

दोस्तों ये ग़ज़ल इसी वक़्त दुनिया में उतरी है। मैं शायरी करता नहीं मगर शरारत कर लेता हूँ। मेरी तरफ से ये आपके लिए हैं। आई टी सेल वालों के लिए फिर कभी लिख दूँगा। अभी वो अपने नेताओं के स्तर तक नहीं गिरे हैं।
रविश कुमार 

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